समाज सेवा की जीवन यात्रा प्रारम्भ करने वाले के लिए एक दीप स्तम्भ

महेंद्र ललकार
आजकल कई लोग अपनी पहचान समाज सेवक के रूप मे करवाते है। कईयो का तो समाज सेवा ही पेशा बन गया है। मनोहरसिह महता एक सच्चे समाज सेवक थे। जीवन मे सेवा के लिए अपनी जवानी मे सरकारी नौकरी छोड़ कर समाज सेवा कर्म अपनाया। जीवन के अन्त तक बिना किसी आडंबर के सहज सेवा की। सेवासंघ के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, अभाव अभियोग, भूदान आन्दोलन, शराब बन्दी, सामाजिक कुरीतियां निवारण, सामाजिक न्याय, हरिजन उद्धार, महिलाजागरण जैसी विविध विधाओ तथा प्रवृतियों द्वारा वे दिन रात जीवन पर्यन्त सेवा मे तल्लीन रहे। सन1933 मे माड़लगढ़ बीगोद प्रान्तीय सेवासंघ सगठन बनाने मे महत्वपूर्ण भूमिका रही। मेहता के नेतृत्व मे सेवासंघ ने आजादी से पूर्व सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक प्रवृतियों द्वारा क्षेत्र मे अभूत पूर्व सेवाएं दी। सन 1932 मेबीगोद के डिस्टलरी भवन मे पहली प्रौढ शाला इन्होने शुरु की। सन 1935 मे जब कांग्रेस ने प्रान्तो की बागडोर अपने हाथ मे ली तब इन्होने शराबबन्दी का काम अपने हाथ मे लिया। सन 1963-64 मे शराबबन्दी का जन आन्दोलन किया। सन1944 मे किसान वृहत बहुधन्धी सहकारी समिति नामक संगठन बना कर जिला प्रशासन के सहयोग से माड़लगढ़ क्षेत्र मे जन उपयोगी खाध्यवस्तुओ के वितरण की व्यवस्था अपने हाथ मे लेकर जन सेवा मे अनुकरणीय योगदान दिया। राजस्थान निर्माण के कई वर्ष बाद भी माड़लगढ़ क्षेत्र मे आवागमन के साधनो की कमी थी। उस समय सीमित की 50बसे चला कर आवागमन की सुविधा बढाई। सन1948 मे देश मे कपडे का भयंकर संकट था। समिति के माध्यम से क्षेत्रीय लोगो को सस्ता कपडा उपलब्ध कराया। अप्रैल 1949 मे राजपूताना प्रदेश का 19 रियासतो के विलयीकरण द्वारा वृहत राजस्थान का निर्माण हुआ। उसके बाद प्रदेश मे दलगत राजनिती का प्रवेश हुआ। सन1946 मे प्रजामडंल के आन्दोलन मे सम्मिलित हुए। राजस्थान के निर्माण के बाद रियासतो के प्रजामडल कांग्रेस की समितियों मे परिवर्तित हुई। वे समाजसेवी सन 1952 तक कांग्रेस के प्रमुख कार्यकर्ताओं मे रहे। सन1967 मे निर्दलीय सदस्य की हैसियत से माड़लगढ़ विधान सभा के लिए चुनाव मे उन्हें मैदान मे उतारा। वे सच्चे जनसेवक विजयी हुए। सन 1977 मे जनता दल के चिन्ह पर माड़लगढ़ विधानसभा से चुनाव मैदान मे रहे। विजयी हुए। उन्होने सन 1980 मे राजनीति से सन्यास लिया। विदित हो वे आजादी से पहले माड़लगढ़ क्षेत्र मे नौकरी मे आए। उस समय यह क्षेत्र पीछडा हुआ जागीर क्षेत्र था। जहां परम्परा से चले आ रहे सारे रितिरिवाज जागीरी तरीके के थे। सबसे पहले महता ने ज्ञान की जोत जगाने का काम प्रोढ़शिक्षा से शुरू कर क्षेत्र सेवा मे जीवन प्रयन्त रहे। सेवासंघ संस्था से जुड़े रहकर पूर्णरूप से अपना जीवन लोक सेवक के रूप मे समर्पित किया। देश के बंटवारे के समय इन्होने बीगोदमे मे आदर्श वातावरण बनाया।वे हिन्दू मुस्लिम एकता के पक्षधर रहे। देश विभाजन के समय जब यहां से मुस्लिम परिवारो ने जाने का मानस बनाया। तब उनके घरो मे बैठकर समझाया। ऐसे लोक सेवक मनोहर सिंह महता 80 वर्ष की उम्र मे 11 अक्टूबर 1990 को इस लोक से चले गये। आज ऐसे राम रहिम के पक्षधर लोक सेवको की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है।
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