नवाजुदीन सिद्दीकी के धमाकेदार डायलोग
03 Oct 2019, 08:16

डायलोग
पैदा तो मैं भी शरीफ हुआ था.. पर शराफत से अपनी कभी नहीं बनी
तुमको याद कर करके हाथ दुख गया हमारा
भगवान के भरोसे मत बैठ्ये ...क्या पता भगवान हमरे भरोसे बैठे हो
शानदार,ज़बरदस्त , जिंदाबाद
जब तक तोड़ेंगे नहीं ... तब तक छोड़ेंगे नहीं
पाबन्दी ही बगावत की शुरुवात है
नफरत बड़ी आसानी से बिक जाती है लेकिन मोहब्बत
जान देने की चीज़ नहीं है...लेने की होती है
हम तो आउटसोर्सिंग करते है ...यमराज के लिए
कफ़न में पॉकेट नहीं होता और उपर अकाउंट ट्रान्सफर नहीं होता
इंसान की राख से उसकी कुंडली निकाल लेता हूँ
फ्री में थोड़ी ना मारेंगे एक एक का पैसा मिला है
भीक मांगे से अच्छा से अच्छा है गुंडा बनके अपना हाक छीनना
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